बिहारी के दोहे
2. बिहारी के दोहे
संदर्भ सहित व्याख्याएँ:
1) सोहत ओढै पीतु पटु, स्याम सलोने गात।
मनो नीलमनि शैल पर, आतपु परयो प्रभात।।
कवि परिचय : बिहारीलाल रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं । उनका जन्म 1595 में ग्वालियर के गोविंदपुर नामक ग्राम में हुआ था । उनके पिता का नाम केशव राय था। बिहारी की प्रमुख रचना है बिहारी सतसई। इसमें कुल मिलाकर 719 दोहे हैं । सतसई में भगवान श्री कृष्ण की महिमा,संयोग वियोग बिरह, भक्ति के वर्णन के साथ साथ नीति को भी दिखाया गया है । बिहारी ने काव्य में छंद एवं अलंकारों का प्रयोग किया है ।
संदर्भ : प्रस्तुत दोहा काव्य निधि पाठ्यपुस्तक के 'बिहारी के दोहे' से लिया गया है । इस दोहे में श्री कृष्ण के सुंदर रूप की प्रशंसा की गई है। भावार्थ: इस दोहे में कवि ने कृष्ण के साँवले शरीर की सुंदरता का बखान किया है। कवि का कहना है कि कृष्ण के साँवले शरीर पर पीला वस्त्र ऐसी शोभा दे रहा है, जैसे नीलमणि पहाड़ पर सुबह की सूरज की किरणें पड़ रही हैं।विशेषताएँ: 1. ब्रज भाषा का प्रयोग
2. श्री कृष्ण की सुंदरता का वर्णन।
2) जगतु जनायौ जिहिं सकलु, सो हरि जान्यौ नाहिं।
जो आँखिनु सब देखिए, आंखि ना देखी जाहिं।।
कवि परिचय : बिहारीलाल रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं । उनका जन्म 1595 में ग्वालियर के गोविंदपुर नामक ग्राम में हुआ था । उनके पिता का नाम केशव राय था। बिहारी की प्रमुख रचना है बिहारी सतसई। इसमें कुल मिलाकर 719 दोहे हैं । सतसई में भगवान श्री कृष्ण की महिमा,संयोग वियोग बिरह, भक्ति के वर्णन के साथ साथ नीति को भी दिखाया गया है । बिहारी ने काव्य में छंद एवं अलंकारों का प्रयोग किया है ।
संदर्भ : प्रस्तुत दोहा काव्य निधि पाठ्यपुस्तक के 'बिहारी के दोहे' से लिया गया है । इस दोहे में आध्यात्मिक ज्ञान की बातें हो रहीं हैं। भावार्थ: बिहारी कहते हैं जिसने तुम्हें सारे संसार का ज्ञान दिया, उसी ईश्वर को तुमने नहीं जाना, नहीं पहचाना ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार अपनी आँखों से सब वस्तुएँ तो देखी जाती हैं, पर स्वयं अपनी ही आँखें नहीं दीख पडतीं। विशेषताएँ: 1. भाषा सरल सुंदर एवं सुगम है।
2.ईश्वर मनुष्य के हृदय में वास करता है।आंखों के उदाहरण से दोहा प्रभावशाली बन पड़ा है। 3. सीस मुकुट कटि काछनी, कर मुरली उर माल ।
यही बानक मो मन बसौ, सदा बिहारी लाल।।
कवि परिचय : बिहारीलाल रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं । उनका जन्म 1595 में ग्वालियर के गोविंदपुर नामक ग्राम में हुआ था । उनके पिता का नाम केशव राय था। बिहारी की प्रमुख रचना है बिहारी सतसई। इसमें कुल मिलाकर 719 दोहे हैं । सतसई में भगवान श्री कृष्ण की महिमा,संयोग वियोग बिरह, भक्ति के वर्णन के साथ साथ नीति को भी दिखाया गया है । बिहारी ने काव्य में छंद एवं अलंकारों का प्रयोग किया है । संदर्भ : प्रस्तुत दोहा काव्य निधि पाठ्यपुस्तक के 'बिहारी के दोहे' से लिया गया है । इस दोहे में श्री कृष्ण की सुंदर छवि का वर्णन किया है। भावार्थ: बिहारी अपने इस दोहे में कहते हैं हे कान्हा, तुम्हारें हाथ में मुरली हो, सर पर मोर मुकुट हो तुम्हारें गले में माला हो और तुम पीली धोती पहने रहो इसी रूप में तुम हमेशा मेरे मन में बसते हो। विशेषताएँ: 1. श्री कृष्ण की सुंदर छवि का वर्णन।
2. शुद्ध ब्रज भाषा का प्रयोग।
4. बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाइ।
सौंह करैं भौहनि हंसै, दैन कहै नटि जाइ।।
कवि परिचय : बिहारीलाल रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं । उनका जन्म 1595 में ग्वालियर के गोविंदपुर नामक ग्राम में हुआ था । उनके पिता का नाम केशव राय था। बिहारी की प्रमुख रचना है बिहारी सतसई। इसमें कुल मिलाकर 719 दोहे हैं । सतसई में भगवान श्री कृष्ण की महिमा,संयोग वियोग बिरह, भक्ति के वर्णन के साथ साथ नीति को भी दिखाया गया है । बिहारी ने काव्य में छंद एवं अलंकारों का प्रयोग किया है । संदर्भ: प्रस्तुत दोहा काव्य निधि पाठ्यपुस्तक के 'बिहारी के दोहे' से लिया गया है । इस दोहे में गोपियों श्रीकृष्ण के परिहास का वर्णन किया है।
भावार्थ: गोपियाँ अपने परम प्रिय कृष्ण से बातें करने का अवसर खोजती रहती हैं। इसी बतरस (बातों के आनंद) को पाने के। प्रयास में उन्होंने कृष्ण की वंशी को छिपा दिया है। कृष्ण वंशी के खो जाने पर बड़े व्याकुल हैं। वे गोपियों से वंशी के बारे में पूछते हैं तो गोपियाँ (झूठी) सौगंध खाकर कहती हैं कि उन्हें वंशी के बारे में कुछ पता नहीं। साथ ही वे भौंहों के संकेतों में मुसकराती भी जाती हैं। कृष्ण को लगता है कि वंशी इन्हीं के पास है। किन्तु जब वह वंशी लौटाने को कहते हैं तो गोपियाँ साफ मना कर देती हैं। विशेष- (i) कृष्ण और गोपियों के इस सरस परिहास द्वारा, कवि ने संयोग श्रृंगार का सजीव शब्द-चित्र प्रस्तुत कर दिया है।
(ii) श्रृंगार रस के भाव-अनुभावों का मनोहारी चित्रण हुआ है।
(iii) ‘गागर में सागर’ भरने की बिहारी लाल की दक्षता प्रमाणित हो रही है। (iv) अनुप्रास अलंकार को भी स्पर्श है।
5. बड़े ना हूजै गुननि बिनु, बिरद बड़ाई पाय।
कनक धतूरे सों कहत, गहनों गढो ना जाए।।
कवि परिचय : बिहारीलाल रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं । उनका जन्म 1595 में ग्वालियर के गोविंदपुर नामक ग्राम में हुआ था । उनके पिता का नाम केशव राय था। बिहारी की प्रमुख रचना है बिहारी सतसई। इसमें कुल मिलाकर 719 दोहे हैं । सतसई में भगवान श्री कृष्ण की महिमा,संयोग वियोग बिरह, भक्ति के वर्णन के साथ साथ नीति को भी दिखाया गया है । बिहारी ने काव्य में छंद एवं अलंकारों का प्रयोग किया है । संदर्भ: प्रस्तुत दोहा काव्य निधि पाठ्यपुस्तक के 'बिहारी के दोहे' से लिया गया है । इस दोहे में बताया गया है कि नाम से नहीं अपितु गुणों से मनुष्य की पहचान होती है । भावार्थ: व्यक्ति चाहे जितना बड़ा हो जाए, यश और ख्याति प्राप्त कर लें, लेकिन बिना गुणों के महानता नहीं प्राप्त कर सकता। बिहारीलाल कहते हैं कि धतूरे को भी कनक कहा जाता है लेकिन सोने की तरह उससे गहने नहीं बनवाए जा सकते।विशेषताएँ: 1. लोक व्यवहार के यथार्थ को प्रस्तुत किया है।
2. इसमें अर्थांतरन्यास अलंकार का प्रयोग।
6. कैसे छोटे नरनु तैं, सरत बड़नु के काम ।
मढयौ दमामौ जातु क्यौं, कहि चूहे कैं चाम।।
कवि परिचय : बिहारीलाल रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं । उनका जन्म 1595 में ग्वालियर के गोविंदपुर नामक ग्राम में हुआ था । उनके पिता का नाम केशव राय था। बिहारी की प्रमुख रचना है बिहारी सतसई। इसमें कुल मिलाकर 719 दोहे हैं । सतसई में भगवान श्री कृष्ण की महिमा,संयोग वियोग बिरह, भक्ति के वर्णन के साथ साथ नीति को भी दिखाया गया है । बिहारी ने काव्य में छंद एवं अलंकारों का प्रयोग किया है । संदर्भ: प्रस्तुत दोहा काव्य निधि पाठ्यपुस्तक के 'बिहारी के दोहे' से लिया गया है । इस दोहे में बताया गया है जिसका काम उसी को शोभा देता है। भावार्थ: कवि कहते हैं - ओछे आदमियों से बड़े आदमी के काम की अपेक्षा नहीं की जा सकती है । जिस प्रकार चूहे के चमड़े से नगाड़ा कैसे मढ़ा जा सकता है? विशेषताएँ: 1. ब्रज भाषा का प्रयोग
2. श्लेष अलंकार का प्रयोग।
7. जपमाला छापे तिलक सरै ना एकौ कामु।
मन कांचे नाचे वृथा, सांचे रांचै रामु।।
कवि परिचय : बिहारीलाल रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं । उनका जन्म 1595 में ग्वालियर के गोविंदपुर नामक ग्राम में हुआ था । उनके पिता का नाम केशव राय था। बिहारी की प्रमुख रचना है बिहारी सतसई। इसमें कुल मिलाकर 719 दोहे हैं । सतसई में भगवान श्री कृष्ण की महिमा,संयोग वियोग बिरह, भक्ति के वर्णन के साथ साथ नीति को भी दिखाया गया है । बिहारी ने काव्य में छंद एवं अलंकारों का प्रयोग किया है । संदर्भ: प्रस्तुत दोहा काव्य निधि पाठ्यपुस्तक के 'बिहारी के दोहे' से लिया गया है । इस दोहे में बाहरी आडंबरों का खंडन किया है। भावार्थ: प्रस्तुत दोहे में कवि बिहारी कहते हैं कि बाहरी दिखावा, पाखण्ड व्यर्थ है। भगवान भाव से प्रसन्न होते हैं, पाखण्ड से नहीं। जप करना, माला पहनना, छापा और तिलक लगाना इन सब प्रकार के पाखण्डों से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती है। बल्कि जब तक तेरा मन कच्चा है, तब तक तेरा यह सारा नाचा अर्थात् पाखण्ड व्यर्थ है, इसलिए व्यक्ति को विषय-वासनाएँ मिटाकर और बाहरी आडम्बरों को त्यागकर सच्चे मन से ईश्वर की उपासना करनी चाहिए क्योंकि राम अर्थात् भगवान तो सच्ची भावना से प्रसन्न होते हैं।
विशेष : भाषा – ब्रज और संस्कृत भाषा के शब्दों का प्रयोग। भाव – भक्ति और नीति परक।
8. कहत सबै, बेन्दी दियै, आंकु दस गुनौ होतु।
तिय - लिलार बेन्दी दियै अगिनितु बढ़त उदोतु।।
कवि परिचय : बिहारीलाल रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं । उनका जन्म 1595 में ग्वालियर के गोविंदपुर नामक ग्राम में हुआ था । उनके पिता का नाम केशव राय था। बिहारी की प्रमुख रचना है बिहारी सतसई। इसमें कुल मिलाकर 719 दोहे हैं । सतसई में भगवान श्री कृष्ण की महिमा,संयोग वियोग बिरह, भक्ति के वर्णन के साथ साथ नीति को भी दिखाया गया है । बिहारी ने काव्य में छंद एवं अलंकारों का प्रयोग किया है । संदर्भ: प्रस्तुत दोहा काव्य निधि पाठ्यपुस्तक के 'बिहारी के दोहे' से लिया गया है । इस दोहे में भारतीय संस्कृति की महानता के बारे में लिखा है। भावार्थ:गणित के अनुसार किसी भी संख्या के आगे बिंदी अर्थात् शून्य लगाने पर उसको मूल्य दस गुना हो जाता है, परन्तु सौन्दर्य शास्त्र के नियम अलग हैं। कवि के अनुसार सुन्दर नारी के मस्तक पर बिंदी लगाए जाने पर उसकी सुन्दरता या शोभा अनगिनत बढ़ जाती है। यहाँ गणित का नियम काम नहीं करता। विशेष- (i) दोहे में कवि ने अपनी चमत्कारपूर्ण कथन की प्रवीणता का परिचय कराया है। (ii) भाषा साहित्यिक है और कथन शैली वचन-वक्रता (कुछ नए ढंग से बात कहना) का सुन्दर नमूना है।
9. बढ़त - बढ़त संपति- सलिलु, मन सरोज बढि जाई।
घटत- घटत सु न फिरि घटै, बरू समूल कुम्हिलाई।।
कवि परिचय : बिहारीलाल रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं । उनका जन्म 1595 में ग्वालियर के गोविंदपुर नामक ग्राम में हुआ था । उनके पिता का नाम केशव राय था। बिहारी की प्रमुख रचना है बिहारी सतसई। इसमें कुल मिलाकर 719 दोहे हैं । सतसई में भगवान श्री कृष्ण की महिमा,संयोग वियोग बिरह, भक्ति के वर्णन के साथ साथ नीति को भी दिखाया गया है । बिहारी ने काव्य में छंद एवं अलंकारों का प्रयोग किया है । संदर्भ: प्रस्तुत दोहा काव्य निधि पाठ्यपुस्तक के 'बिहारी के दोहे' से लिया गया है । इस दोहे में मन की इच्छाओं को काबू में रखने के लिए कहा है। भावार्थ: बिहारी लाल कहते हैं कि सम्पत्ति रूपी पानी जैसे-जैसे बढ़ता जाता है वैसे-वैसे मन रूपी सरोज फैलता जाता है। अर्थात् मन की इच्छाएँ एवं प्रलोभन में वृद्धि होती जाती है। लेकिन सम्पत्ति रूपी पानी जैसे-जैसे घटता है, मन रूपी कमल संकुचित नहीं होता बल्कि पूर्ण रूप से मुरझा जाता है। इसलिए मन की इच्छाओं को काबू में रखना चाहिए नहीं तो मानव जीवन में आनंद की क्षति हो जाती है।
विशेष : नीति परक दोहा। अलंकार : अनुप्रास।
10. समै समै सुंदर सबै, रूप कुरूप न कोई।
मन की रूचि जेती जितै, तित तेति रूचि होइ।।
कवि परिचय : बिहारीलाल रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं । उनका जन्म 1595 में ग्वालियर के गोविंदपुर नामक ग्राम में हुआ था । उनके पिता का नाम केशव राय था। बिहारी की प्रमुख रचना है बिहारी सतसई। इसमें कुल मिलाकर 719 दोहे हैं । सतसई में भगवान श्री कृष्ण की महिमा,संयोग वियोग बिरह, भक्ति के वर्णन के साथ साथ नीति को भी दिखाया गया है । बिहारी ने काव्य में छंद एवं अलंकारों का प्रयोग किया है ।संदर्भ : प्रस्तुत दोहे की पंक्तियां काव्य निधि पाठ्यपुस्तक में बिहारी के दोहे से ली गई हैं । इसमें बिहारी ने सौंदर्य की परिभाषा दी है। भावार्थ: यह समय-समय की बात होती है कि कोई वस्तु हमें किसी समय सुंदर प्रतीत होती है तो वही वस्तु किसी और समय सुंदर नहीं प्रतीत होती। यह मन की रुचि और अरुचि पर निर्भर करता है। इसका अर्थ यह है कि अपने आप में कोई वस्तु सुंदर या कुरुप नहीं होती। विशेषताएँ: 1.नीतिपरक दोहा
2. ब्रज भाषा का प्रयोग।
दीर्घ प्रश्न- उत्तर
1. बिहारी का जीवन परिचय दीजिए।
Ans. बिहारी हिंदी साहित्य के रीतिकाल के अत्यंत लोकप्रिय कवि हैं । इनका जन्म 1595 ग्वालियर राज्य के बसवा गोविंदपुर नामक ग्राम में हुआ था। बिहारी के गुरु नरहरिदास है । बिहारी राजा जयसिंह के दरबार में कवि थे। बिहारी श्रृंगारी कवि हैं ।
रीतिकालीन कवि बिहारी अपने युग के अद्वितीय कवि हैं| बिहारी उच्चकोटि के कवि एवं कलाकार थे | असाधारण कल्पना शक्ति मानव – प्रकृति के सूक्ष्म ज्ञान तथा कला – निपुणता ने बिहारी के दोहों में अपरिमित रस भर दिया है | इन्हीं गुणों के कारण इन्हें रीतिकालीन कवियों का प्रतिनिधि कवि कहा जाता है। तत्कालीन परिस्थितियों से प्रेरित होकर उन्होंने जिस साहित्य का सृजन किया, वह हिंदी – साहित्य की अमूल्य निधि है | सौन्दर्य – प्रेम के चित्रण में, भक्ति एवं नीति के समन्वय में, ज्योतिष – गणित – दर्शन के निरूपण में तथा भाषा के लाक्षणिक एवं मधुर व्यंजक प्रयोग की दृष्टि से बिहारी बेजोड़ हैं | भाव और शिल्प दोनों दृष्टियों से इनका काव्य श्रेष्ठ है |
2. बिहारी का साहित्यिक परिचय दीजिये।
Ans. रीतिकालीन कवियों में महाकवि बिहारी की गणना अपनी कला के प्रतिनिधि कवि के रूप में की जाती है| बिहारी के श्रृंगार सम्बन्धी दोहे अपनी सफल भावाभिव्यक्ति के लिए विशिष्ट समझे जाते हैं| इनमें संयोग और वियोग श्रृंगार के मर्मस्पशी चित्र मिलते हैं| इनमें आलम्बन के विशद वर्णन के साथ – साथ उद्दीपन के चित्र हैं| 719 दोहों की सतसई सन् 1719 में समाप्त हुई | इनके दोहों के विषय में यह उक्ति प्रसिध्द है –सतसैया के दोहरे , ज्यों नाविक के तीर |
देखन में छोटे लगैं , घाव करैं गम्भीर ।। संक्षेप में बिहारी का काव्य उनकी काव्यात्मक प्रतिभा के ऐसे विलक्षण एवं अद्भुत स्वरूप को प्रस्तुत करता है, जो हिंदी काव्य जगत के विख्यात कवियों के लिए भी विस्मयपूर्ण रहा है |रचनाएँ अथवा ग्रन्थ :-
बिहारी की एकमात्र रचना “बिहारी सतसई” है| इसमें बिहारी ने कुल 719 दोहे लिखे हैं| ‘सतसई‘ में नीति, भक्ति और श्रृंगार सम्बन्धी दोहे हैं| ‘बिहारी –
सतसई’ के सामान लोकप्रियता रीतिकाल के किसी अन्य ग्रंथ को प्राप्त ना हो सकी | इस कृति ने बिहारी को हिंदी – काव्य – जगत में अमर कर दिया है |भाषा:-
बिहारी की भाषा साहित्यिक ब्रजभाषा है, जिसमें पूर्वी – हिन्दी, बुंदेलखंडी, उर्दू, फारसी आदि भाषाओ के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है| शब्द चयन की दृष्टि से बिहारी अद्वितीय है | मुहावरो और लोकोक्तियों की दृष्टि से भी उनका भाषा – प्रयोग अद्वितीय है| बिहारी की भाषा इतनी सुगठित है कि उनका एक शब्द भी अपने स्थान से हटाया नहीं जा सकता | भाषा की दृष्टि से इनका काव्य उच्चकोटि का है |शैली :-
बिहारी ने मुक्तक काव्य – शैली को स्वीकार किया है जिसमें समास शैली का अनूठा योगदान है | इसलिए ‘दोहा’ जैसे छोटे छन्द में इन्होंने अनेक भावो को भर दिया है | बिहारी की शैली समय के साथ बदलती है | भक्ति एवं नीति के दोहों में प्रसाद गुण की तरह तथा श्रृंगार के दोहों में माधुर्य एवं प्रसाद की प्रधानता है| शैली की दृष्टि से बिहारी जी का काव्य अनुपम व अद्वितीय है |हिंदी – साहित्य में स्थान:-
रीतिकालीन कवि बिहारी अपने युग के अद्वितीय कवि हैं| बिहारी उच्चकोटि के कवि एवं कलाकार थे | असाधारण कल्पना शक्ति मानव – प्रकृति के सूक्ष्म ज्ञान तथा कला – निपुणता ने बिहारी के दोहों में अपरिमित रस भर दिया है | इन्हीं गुणों के कारण इन्हें रीतिकालीन कवियों का प्रतिनिधि कवि कहा जाता है तत्कालीन परिस्थितियों से प्रेरित होकर उन्होंने जिस साहित्य का सृजन किया, वह हिंदी – साहित्य की अमूल्य निधि है | सौन्दर्य – प्रेम के चित्रण में, भक्ति एवं नीति के समन्वय में, ज्योतिष – गणित – दर्शन के निरूपण में तथा भाषा के लाक्षणिक एवं मधुर व्यंजक प्रयोग की दृष्टि से बिहारी बेजोड़ हैं | भाव और शिल्प दोनों दृष्टियों से इनका काव्य श्रेष्ठ है |
लघु प्रश्न- उत्तर
1. बिहारी की प्रसिद्ध रचना का नाम क्या है?
Ans.बिहारी की प्रसिद्ध रचना का नाम बिहारी सतसई है।2. बिहारी की कविता का प्रधान रस क्या है ?
Ans. बिहारी की कविता का प्रधान रस श्रृंगार है।
3. बिहारी की मृत्यु कब हुई?
Ans. बिहारी की मृत्यु सन 1663 में हुई।
4. बिहारी के पिता का नाम क्या था?
Ans. बिहारी के पिता का नाम केशव राय था।
5. बिहारी किसके भक्त थे ?
Ans.बिहारी श्री कृष्ण के भक्त थे ।
6. बिहारी का जन्म कहां हुआ?
Ans. बिहारी का जन्म गवालियर राज्य के बसुआ गोविंदपुर नामक ग्राम में हुआ।
7. बिहारी की साहित्यिक भाषा क्या है?
Ans. बिहारी की साहित्यिक भाषा ब्रज है।
8.बिहारी किस राजा के आश्रय में थे?
Ans. बिहारी राजा जयसिंह के आश्रय में थे।
9.बिहारी सतसई में कितने दोहे हैं ?
Ans. बिहारी सतसई में 719 दोहे हैं ।
10. बिहारी हिंदी साहित्य के किस काल के प्रमुख कवि थे?
Ans. बिहारी हिंदी साहित्य के रीतिकाल के प्रमुख कवि थे। ********
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