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Showing posts from July, 2021

कलम और तलवार

5. कलम और तलवार सारांश : राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी ने 'कलम और तलवार' नामक कविता में कलम और तलवार दोनों को प्रधानता दी है। उनके अनुसार कलम और तलवार दोनों में ही बदलाव लाने की क्षमता होती है। दोनों में ही तेज धार होती है। पर फर्क इतना है कि कलम की धार विचारों को जगाती है, तो तलवार की धार खून की धारा बहा सकती है। कलम के द्वारा विचारों की अभिव्यक्ति से समाज को जगाया जा सकता है, तो दूसरी और अस्त्र-शस्त्र हाथों में लेकर युद्ध जीता जा सकता है। जहांँ मनुष्य समाज में चेतना पैदा करने की बात आए तो कलम ही कारगर साबित होता है। वही युद्ध में तथा हिंसक पशुओं से आत्मरक्षा हेतु तलवार की आवश्यकता पड़ती है।यदि समाज में चारों ओर सुरक्षा और निर्भरता हो तो अस्त्र शस्त्रों का नहीं बल्कि कलम का ही काम होता है। यह हम पर निर्भर करता है कि हमे किसको अपनाकर समाज का निर्माण करना है। अतः कलम और तलवार में से कलम की शक्ति अधिक है तथा कलम के द्वारा देश में हो रहे भ्रष्टाचार एवं बुराइयों को मिटाया जा सकता है। अतः ज्ञानशक्ति से ही देश की तरक्की...

वे मुस्काते फूल नहीं

4. वे मुस्काते फूल नहीं सारांश: महादेवी जी के इस सरस गीत में वेदना की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। वे अपने अज्ञात प्रियतम की विरह की पीड़ा पर अपना अधिकार बनाये रखना चाहती है। वे सर्वसुख सम्पन्न लोक की कामना नहीं करतीं। वे सांसारिक जीवन में ही रहने की कामना करती हैं।               महादेवी वर्मा का कहना है कि अमर लोक में फूल केवल खिलना जानते हैं,कभी मुरझाते नहीं। तारे रुपी दीपक जैसे चमकते हैं, जो बुझते नहीं है। जहाँ ऋतुयें अनंत है और बादल भी घुलते नहीं। वह ऐसा लोक है जहाँ दुःख और वेदना नहीं, जलना और मिटना भी नही।       जहाँ आंखें सूनी है और यह प्राणों की सेज है पर  पीड़ा बेहोश पड़ी रहती है ।  इसलिए कवित्री मानती हैं कि फूल तभी सुंदर लगते हैं जो मुरझा कर फिर खिलते हैं और वातावरण को सुगंधित करते हैं। तारे भी जब बुझकर जलते हैं और बादल घुल कर फिर आते हैं । ऋतुएँ भी बदलती हैं तभी अहमियत रखती हैं । किसी भी वस्तु की महत्वता उसके अनश्वर रूप में नहीं अपितु नश्वर रुप में है। इसलिए कवित्री देव लोक की अपेक्षा सांसारिक लोक को अधिक सार्थक मानत...

भगवान बुद्ध के प्रति

भगवान बुद्ध के प्रति 3. भगवान बुद्ध के प्रति सारांश : भगवान बुध के प्रति कविता सूर्यकांत त्रिपाठी निराला नैंसी है निराला हिंदी युग प्रवर्तक कवि माने जाते हैं उनका जन्म 1 896 में बसंत पंचमी के दिन बंगाल के महिषादल राज्य में हुआ।       कवि इस कविता के माध्यम से बता रहे हैं कि संपूर्ण विश्व में आज सभ्यता विज्ञान को ही सब कुछ मान रही है। पूरा विश्व विनाश की ओर जा रहा है  वैज्ञानिक साधन केवल सुख के लिए खिलौने मात्र बन गए हैं । सिर्फ पैसे कमाना ही मनुष्य का लक्ष्य हो गया है । पृथ्वी, जल, आकाश, रेल, तार, बिजली, जहाज, हवाई जहाजों में वैज्ञानिकता का प्रचार कर मनुष्य घमंड दिखा रहा है। आध्यात्मिकता पर विश्वास खो कर लोग जनवादी बनकर एक वर्ग दूसरे वर्ग से, एक देश दूसरे देश से और एक का स्वास्थ दूसरे के स्वार्थ से लड़ रहा है ,वर्तमान में लोग आध्यात्मिकता पर विश्वास खो कर अतीत को मानव के लिए भयंकर मानते हैं और कहते हैं कि अतीत में हमारे पूर्वज अतीत में जंगली लोगों की तरह थे, अशिक्षित थे और निपुण नहीं थे । उस समय लोगों को आज की तरह स्वतंत्रता नहीं थी । इस बात का खंडन करते हुए कवि कह रहे हैं कि हे ...

बिहारी के दोहे

2. बिहारी के दोहे संदर्भ सहित व्याख्याएँ: 1)  सोहत ओढै पीतु पटु,  स्याम सलोने गात।       मनो नीलमनि शैल पर, आतपु परयो प्रभात।। कवि परिचय : बिहारीलाल रीतिकाल के  प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं । उनका जन्म 1595 में ग्वालियर के गोविंदपुर नामक ग्राम में हुआ था । उनके पिता का नाम केशव राय था। बिहारी की प्रमुख रचना है बिहारी सतसई। इसमें कुल मिलाकर 719 दोहे हैं । सतसई में भगवान श्री कृष्ण की महिमा,संयोग वियोग बिरह, भक्ति के वर्णन के साथ साथ नीति को भी दिखाया गया है । बिहारी ने काव्य में छंद एवं अलंकारों का प्रयोग किया है । संदर्भ : प्रस्तुत दोहा काव्य निधि पाठ्यपुस्तक के 'बिहारी के दोहे' से लिया गया है । इस दोहे में श्री कृष्ण के सुंदर रूप की प्रशंसा की गई है। भावार्थ: इस दोहे में कवि ने कृष्ण के साँवले शरीर की सुंदरता का बखान किया है। कवि का कहना है कि कृष्ण के साँवले शरीर पर पीला वस्त्र ऐसी शोभा दे रहा है, जैसे नीलमणि पहाड़ पर सुबह की सूरज की किरणें पड़ रही हैं।विशेषताएँ: 1. ब्रज भाषा का प्रयोग                  2. श्री कृष्ण की सुंदरता का वर्णन। 2) जगतु जनायौ जिहिं सकलु, सो हरि जान...

रहीम के दोहे

Semester IV (REDUCED)                                 रहीम के दोहे कवि परिचय रहीम का पूरा नाम अब्दुल रहीम खानखाना है । इनके पिता बैरम खान है इनका जन्म 1554 में हुआ । इनका पालन-पोषण अकबर ने किया । अकबर के दरबार में वह महत्वपूर्ण पद में रहते थे। रहीम अरबी, तुर्की, फारसी, संस्कृत और हिंदी के अच्छे ज्ञाता थे । इनकी प्रमुख रचनाएं हैं - दोहावली, नगर शोभा, बरवै नायिका भेद, मदनाष्ट्क, रहीम खेट कौतुकम, रासपंचाध्यायी, रहीम सतसई, श्रृंगार सतसई, श्रृंगार सोरठा।     रहीम ने विभिन्न भाषाओं और काव्य शैलियों में रचनाएं की हैं । इनके काव्य मे सूक्ष्म जीवन अनुभूति और नीति मिलती है । उनके दोहों में नीति ज्ञान और श्रृंगार की त्रिवेणी प्रवाहित है।        संदर्भ सहित व्याख्याएँ: 1. रहिमन तब तक  ठिहरिये, मान मान सम्मान ।    घटत मान देखिए जबहि, तुरतहि करिय  पयान।।      कवि परिचय: यह दोहा रहीम के द्वारा लिखा गया है। उनका पूरा नाम अब्दुल रहीम खानखाना है यह अकबर के दरबारी कवि थे। विशेष संदर्भ: मानव के स्वाभिमान के बारे में बताया है। भावार्...