वे मुस्काते फूल नहीं

4. वे मुस्काते फूल नहीं सारांश: महादेवी जी के इस सरस गीत में वेदना की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। वे अपने अज्ञात प्रियतम की विरह की पीड़ा पर अपना अधिकार बनाये रखना चाहती है। वे सर्वसुख सम्पन्न लोक की कामना नहीं करतीं। वे सांसारिक जीवन में ही रहने की कामना करती हैं।               महादेवी वर्मा का कहना है कि अमर लोक में फूल केवल खिलना जानते हैं,कभी मुरझाते नहीं। तारे रुपी दीपक जैसे चमकते हैं, जो बुझते नहीं है। जहाँ ऋतुयें अनंत है और बादल भी घुलते नहीं। वह ऐसा लोक है जहाँ दुःख और वेदना नहीं, जलना और मिटना भी नही।       जहाँ आंखें सूनी है और यह प्राणों की सेज है पर  पीड़ा बेहोश पड़ी रहती है ।  इसलिए कवित्री मानती हैं कि फूल तभी सुंदर लगते हैं जो मुरझा कर फिर खिलते हैं और वातावरण को सुगंधित करते हैं। तारे भी जब बुझकर जलते हैं और बादल घुल कर फिर आते हैं । ऋतुएँ भी बदलती हैं तभी अहमियत रखती हैं । किसी भी वस्तु की महत्वता उसके अनश्वर रूप में नहीं अपितु नश्वर रुप में है। इसलिए कवित्री देव लोक की अपेक्षा सांसारिक लोक को अधिक सार्थक मानती है । क्योंकि सांसारिक लोक में फूल मुरझा जाते भी हैं,ऋतुएँ बदलती हैं और दीपक बुझ कर खुद जलते हैं। यही जीवन का नियम है। विशेषताएँ: 1. भाषा सहज सरल प्रभावपूर्ण है जो कि शुद्ध साहित्यिक मधुर तथा कोमल भावों से युक्त है। 2. संस्कृत प्रधान  तत्सम शब्दावली का प्रयोग हुआ है।   3. भावों की तरलता, दर्शन की गहराई, अभिव्यक्ति की तन्मयता महादेवी वर्मा के काव्य की विशेषता है। 4.कवित्री देवलोक की अपेक्षा सांसारिक लोग को अधिक सार्थक मानती है। संदर्भ सहित व्याख्या: 1.वे मुस्काते फूल, नहीं - जिनको आता है मुरझाना,   वे तारों के दीप नहीं जिनको भाता है बुझ जाना;  कवि परिचय: छायावादी कवियों में प्रसाद ,निराला,पंत के बाद महादेवी वर्मा का नाम उल्लेखनीय है । महादेवी की काव्य साधना रहस्य साधना के समान प्रतीत होती है । प्रणय और वेदना उनके गीतों की प्रमुख वस्तु है। 'निहार' से लेकर 'दीपशिखा' एवं 'मैं नीर भरी दुख की बदली' तक का पूरा काव्य वेदना से ओतप्रोत है । महादेवी के गीतों में विरह की प्रधानता रहती है । संयोग का तो केवल संकेत मात्र प्राप्त होता है । उनके काव्य में विस्तार की अपेक्षा गहराई अधिक है । उन्होंने अपने आराध्य को प्रियतम के रूप में चित्रित किया है । इसलिए उन्हें आधुनिक मीरा की उपाधि भी दी गई है। उनके गीतों में नारी हृदय की सहज संवेदना रूपायित हो सकी हैं। संदर्भ : प्रस्तुत पंक्तियां 'वे मुस्काते फूल नहीं' गीतमय कविता से संग्रहित की गई है । इस गीत में महादेवी देवलोक का तिरस्कार करके सांसारिक लोक का ही वर्णन करती है। उनका कहना है कि स्वर्ग में जीवन एक रूप ही रहता है । वहां दुख नहीं है, मृत्यु नहीं है,परिवर्तन नहीं है। इसलिए ऐसे जीवन में कोई भी आकर्षण नहीं है। भावार्थ: महादेवी वर्मा का कहना है कि अमर लोक में फूल केवल खिलना जानते हैं,कभी मुरझाते नहीं। तारे रुपी दीपक जैसे चमकते हैं किंतु वे भी बुझना पसंद नहीं करते। कवित्रि मानती है कि परिवर्तन ही सुंदर होता है। फूल वही सुंदर होते हैं जो मुरझा के फिर खिलते हैं। तारे वही सुंदर है जो डूब के फिर निकले। विशेषताएँ:1. भाषा सहज सरल प्रभावपूर्ण है जो कि शुद्ध साहित्यिक मधुर तथा कोमल भावों से युक्त है। 2. संस्कृत प्रधान  तत्सम शब्दावली का प्रयोग हुआ है।   3. भावों की तरलता, दर्शन की गहराई, अभिव्यक्ति की तन्मयता महादेवी वर्मा के काव्य की विशेषता है। 4.कवित्री देवलोक की अपेक्षा सांसारिक लोग को अधिक सार्थक मानती है। 2. वे सूने से नयन,नहीं -     जिनमें बनते आंसू मोती,     वह प्राणों की सेज नहीं -     जिसमें बेसुध पीड़ा सोती;     वे नीलम के मेघ, नहीं -     जिनको है घुल जाने की चाह     वह अनंत ऋतुराज,     नहीं जिसने देखी जाने की राह। कवि परिचय: छायावादी कवियों में प्रसाद ,निराला,पंत के बाद महादेवी वर्मा का नाम उल्लेखनीय है । महादेवी की काव्य साधना रहस्य साधना के समान प्रतीत होती है । प्रणय और वेदना उनके गीतों की प्रमुख वस्तु है। 'निहार' से लेकर 'दीपशिखा' एवं 'मैं नीर भरी दुख की बदली' तक का पूरा काव्य वेदना से ओतप्रोत है । महादेवी के गीतों में विरह की प्रधानता रहती है । संयोग का तो केवल संकेत मात्र प्राप्त होता है । उनके काव्य में विस्तार की अपेक्षा गहराई अधिक है । उन्होंने अपने आराध्य को प्रियतम के रूप में चित्रित किया है । इसलिए उन्हें आधुनिक मीरा की उपाधि भी दी गई है। उनके गीतों में नारी हृदय की सहज संवेदना रूपायित हो सकी हैं। संदर्भ : प्रस्तुत पंक्तियां 'वे मुस्काते फूल नहीं' गीतमय कविता से संग्रहित की गई है । इस गीत में महादेवी देवलोक का तिरस्कार करके सांसारिक लोक का ही वर्णन करती है। उनका कहना है कि स्वर्ग में जीवन एक रूप ही रहता है । वहां दुख नहीं है, मृत्यु नहीं है,परिवर्तन नहीं है। इसलिए ऐसे जीवन में कोई भी आकर्षण नहीं है। भावार्थ: महादेवी वर्मा कहती हैं बिना आसुंओं के नयन शोभा नहीं देते। सेज वही शोभा देती है जहाँ पीड़ा बेसुध नहीं जिंदा हो। मेघ वही शोभा देते हैं जो घुल फिर आते हैं। ऋतुओं में परिवर्तन ही उन्हें शोभा देती है। विशेषताएँ: 1. भाषा सहज सरल प्रभावपूर्ण है जो कि शुद्ध साहित्यिक मधुर तथा कोमल भावों से युक्त है। 2. संस्कृत प्रधान  तत्सम शब्दावली का प्रयोग हुआ है।   3. भावों की तरलता, दर्शन की गहराई, अभिव्यक्ति की तन्मयता महादेवी वर्मा के काव्य की विशेषता है। 4.कवित्री देवलोक की अपेक्षा सांसारिक लोग को अधिक सार्थक मानती है। 3. ऐसा तेरा लोक, वेदना    नहीं, नहीं जिसमें अवसाद,    जलना जाना नहीं, नहीं    जिसने जाना मिटने का स्वाद!    क्या अमरों का लोक मिलेगा -    तेरी करुणा का उपहार,    रहने दो हे देव ! अरे -    यह मेरा मिटने का अधिकारकवि परिचय: छायावादी कवियों में प्रसाद ,निराला,पंत के बाद महादेवी वर्मा का नाम उल्लेखनीय है । महादेवी की काव्य साधना रहस्य साधना के समान प्रतीत होती है । प्रणय और वेदना उनके गीतों की प्रमुख वस्तु है। 'निहार' से लेकर 'दीपशिखा' एवं 'मैं नीर भरी दुख की बदली' तक का पूरा काव्य वेदना से ओतप्रोत है । महादेवी के गीतों में विरह की प्रधानता रहती है । संयोग का तो केवल संकेत मात्र प्राप्त होता है । उनके काव्य में विस्तार की अपेक्षा गहराई अधिक है । उन्होंने अपने आराध्य को प्रियतम के रूप में चित्रित किया है । इसलिए उन्हें आधुनिक मीरा की उपाधि भी दी गई है। उनके गीतों में नारी हृदय की सहज संवेदना रूपायित हो सकी हैं। संदर्भ : प्रस्तुत पंक्तियां 'वे मुस्काते फूल नहीं' गीतमय कविता से संग्रहित की गई है । इस गीत में महादेवी देवलोक का तिरस्कार करके सांसारिक लोक का ही वर्णन करती है। उनका कहना है कि स्वर्ग में जीवन एक रूप ही रहता है । वहां दुख नहीं है, मृत्यु नहीं है,परिवर्तन नहीं है। इसलिए ऐसे जीवन में कोई भी आकर्षण नहीं है। भावार्थ: यहाँ महादेवी वर्मा अपने अज्ञात प्रियतम से कहती हैं कि जिसमें न तो विरह वेदना है और न ही किसी का दुख है, हे देव यह लोक मुझे नहीं चाहिए। मैं तो इस लोक में अपने वेदनामय जीवन से ही सुखी हूँ। महादेवी वर्मा इन पक्तियों में कहती हैं कि जिस लोक में अवसाद नहीं, वेदना नहीं, ऐसे लोक को लेकर क्या होगा। विशेषताएँ: 1. भाषा सहज सरल प्रभावपूर्ण है जो कि शुद्ध साहित्यिक मधुर तथा कोमल भावों से युक्त है। 2. संस्कृत प्रधान  तत्सम शब्दावली का प्रयोग हुआ है।   3. भावों की तरलता, दर्शन की गहराई, अभिव्यक्ति की तन्मयता महादेवी वर्मा के काव्य की विशेषता है। 4.कवित्री देवलोक की अपेक्षा सांसारिक लोग को अधिक सार्थक मानती है। दीर्घ प्रश्नप्र. 1 कला पक्ष की दृष्टि से महादेवी वर्मा के काव्य की विशेषताओं के बारे में चर्चा कीजिये उत्तर:महादेवी वर्मा रहस्यवाद और छायावाद की कवयित्री थीं, अतः उनके काव्य में आत्मा-परमात्मा के मिलन विरह तथा प्रकृति के व्यापारों की छाया स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। वेदना और पीड़ा महादेवी जी की कविता के प्राण रहे। उनका समस्त काव्य वेदनामय है। उन्हें निराशावाद अथवा पीड़ावाद की कवयित्री कहा गया है। वे स्वयं लिखती हैं, दुःख मेरे निकट जीवन का ऐसा काव्य है, जिसमें सारे संसार को एक सूत्र में बाँध रखने की क्षमता है। इनकी कविताओं में सीमा के बंधन में पड़ी असीम चेतना का क्रंदन है। यह वेदना लौकिक वेदना से भिन्न आध्यात्मिक जगत की है। वैसे महादेवी इस वेदना को उस दुःख की भी संज्ञा देती हैं, "जो सारे संसार को एक सूत्र में बाँधे रखने की क्षमता रखता है"। वे कहती हैं, "मुझे दुःख के दोनों ही रूप प्रिय हैं। एक वह, जो मनुष्य के संवेदनशील ह्रदय को सारे संसार से एक अविच्छिन्न बंधनों में बाँध देता है और दूसरा वह, जो काल और सीमा के बंधन में पड़े हुए असीम चेतना का क्रंदन है" किंतु, उनके काव्य में पहले प्रकार का नहीं, दूसरे प्रकार का 'क्रंदन' ही अभिव्यक्त हुआ है। यह वेदना सामान्य लोक ह्रदय की वस्तु नहीं है।    महादेवी की कविता वियोग-श्रृंगार प्रधान है। वियोग के जैसे रहस्यमय चित्र उन्होंने अंकित किए हैं, वैसे अत्यंत दुर्लभ हैं। करुण रस की व्यंजना भी उनके काव्य में हुई है। उनके काव्य में सभी छंद मात्रिक हैं। और वे अपने आप में पूर्ण हैं। उनमें संगीत और लय का विशेष रूप से समावेश है। अलंकार योजना अत्यंत स्वाभाविक है और अलंकारों का प्रयोग भावों को तीव्रता प्रदान करने में सहायक सिद्ध हुआ है। उनके काव्य में छायावादी कविता के शिल्प विधान का सफल रूप द्रष्टव्य है। गीतिकाव्य के तत्व अनुभूति प्रवणता, आत्माभिव्यक्ति, संक्षिप्तता, भावान्वित, गेयता आदि उनके काव्य में पूर्णतः दर्शित होते हैं।प्र. 2 करुणा और वेदना की महानता की कवियित्री ने 'वे मुस्काते फूल नहीं' में किस प्रकार वर्णन किया है? उत्तर: महादेवी वर्मा जी वेदना, अवसाद, करुणा, दुःख, यातना, पीड़ा को मानव जीवन के अविभाज्य अंग मानती हैं। वे इन अनुभवों को स्वर्ग सुख से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मानती हैं। स्वर्ग लोक में सुख ही सुख है, दुःख का नाम ही सुनाई नहीं देता। दुःख, अवसाद, पीड़ा आदि ये सब मानव की अमूल्य निधियाँ है। तुम्हारे ऐसे स्वर्ग लोक में आकर मैं क्या करूँ? मुझे तो मानव लोक ही मधुर लगता है। हे भगवान! मधुर पीड़ा से मर मिटने का अधिकार मेरे लिए ही छोड़ दो। एक वाक्य में उत्तर दीजिये। 1. महादेवी वर्मा जी का जन्म कब और कहां हुआ? उत्तर: कवित्री महादेवी वर्मा का जन्म सन 1907 में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में हुआ । 2.महादेवी वर्मा के पिता का नाम क्या है ? उत्तर: महादेवी वर्मा के पिता का नाम गोविंद प्रसाद वर्मा है। 3. महादेवी वर्मा की प्रारंभिक शिक्षा कहां हुई? उत्तर: महादेवी वर्मा की प्रारंभिक शिक्षा इंदौर में हुई। 4. गद्य लेखन में उन्होंने किस किस विधा को अपनाया? उत्तर: गद्य लेखन में महादेवी वर्मा ने रेखाचित्र, संस्मरण आलोचना, निबंध जैसी विधाओं को अपनाया। 5. महादेवी की प्रमुख गद्य कृतियों के नाम लिखिए ? उत्तर : महादेवी की प्रमुख गद्य रचनाएं हैं - पथ के साथी, स्मृति की रेखाएं, अतीत के चलचित्र, श्रृंखला की कड़ियां मेरा परिवार, क्षणदा और साहित्यकार की आस्था।                              ******                    

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